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विश्व बैंक ने भारत के लॉकडाउन मॉडल पर उठाए कई सवाल, कहा- गरीबों का ज़रा भी ध्यान नहीं रखा गया

देश में कोरोना के मामले दोगुनी रफ़्तार से बढ़ रहे है. 14 अप्रैल को 21 दिनों के लॉकडाउन की अवधी ख़त्म हो रही है. अब केंद्र सरकार इसे दो हफ्तों के लिए और बढ़ाने पर विचार कर रही है. सरकार जल्द ही लॉकडाउन बढ़ाने की घोषणा कर सकती है. लेकिन कोरोना वायरस के चलते लगाए गए लॉकडाउन की सबसे ज्यादा मार मज़दूरों पर पड़ी है.

25 मार्च को लगाए गए लॉकडाउन के दौरान देश के लाखों मज़ूदरों ने सैंकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर एक राज्य से दूसरे राज्यों में पलायन किया था. इन मज़दूरों की रोज़ी-रोटी पर संकट मंडरा गया है. इसके चलते सरकार ने सभी राज्यों को निर्देश दिया था कि जो मज़दूर जहां है उन्हें वहीं रोका जाए.

इस बीच विश्व बैंक ने एक चिंताजनक रिपोर्ट दी है. विश्व बैंक ने कहा कि घर लौट रहे प्रवासी मजदूर अप्रभावित राज्यों एवं गावों में कोरोना वायरस ले जाने वाले रोगवाहक हो सकते हैं. प्रारंभिक परिणाम दिखाते हैं कि भारत के जिन इलाकों में ये लोग लौट रहे हैं वहां भी कोविड-19 के मामले सामने आ सकते हैं.

रविवार को अपनी द्विवार्षिक रिपोर्ट में विश्व बैंक ने मज़दूरो के संकट पर बात की. रिपोर्ट में कहा गया, ‘इससे संक्रमण फैलना आसान हो जाता है, खासकर सबसे कमजोर लोगों के बीच जोकि झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोग और प्रवासी मजदूर हैं.’ विश्व बैंक के मुताबिक दक्षिण एशिया और खासकर उसके शहरी इलाके, विश्व में सबसे घनी आबादी वाला क्षेत्र हैं. ऐसे में घरेलू स्तर पर कोरोना वायरस संक्रमण को फैलने से रोकना इस क्षेत्र में एक बड़ी चुनौती है.

विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में लॉकडाउन को अचानक लागू करने पर भी सवाल उठाया है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान में अंतर्देशीय यात्री परिवहन साधनों पर रोक की घोषणा और इसे लागू करने के बीच एक दिन से भी कम समय लगा जिससे अव्यवस्था उत्पन्न हो गई क्योंकि प्रवासी मज़द�

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