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श्रीनाथजि कैसे और कहा प्रकट हुए और अब कहा बिराजित हे

श्रीनाथजि कैसे और कहा प्रकट हुए और अब कहा बिराजित हे

सब कृष्ण अवतार के बाद प्रभु ने कृष्ण अवतार की सभी लीला के बाद इस कलियुग में श्रीनाथजी के विग्रह के रूप में आये है भक्त उद्धार और भक्तो के प्रेम के लिए सभी ध्यान से पढ़े
कृष्ण के जाने बाद ब्रिजवसी की पीढ़ी भी चलती ही रही कलियुग आया

द्वापर में श्री कृष्ण थे उनके बाद युग गया कलियुग आया कलियुग के कई साल बीते उसके बाद गोवर्धन पर्वत पर गोवर्धन के आस पास के ब्रिजवसियो की गाय नित्य चरने जाती थी जिसमे एक ब्रिजवसी सद्दू पाण्डे की गाय का जुंण्ड भी गोवर्धन पर चरने जाता पर उसी में से एक गाय जिसका नाम धूमर था वो शाम को आकर दूध नही देती थी तब ही सद्दू पाण्डे को लगा की उसकी गाय का दूध कोई न कोई निकाल लेता है तब वो उसके पीछे पीछे गया तब वो देखता है कि पर्वत की एक शिला के पास एक भुजा (हाथ) निकला हुआ है और उसी पर धूमर गाय के थनों से अपने आप दूध भुजा पर गिर रहा है यह देखके सभी को उसने बताया सभी ने भुजा के दर्शन किये नागपंचमी के दिन यह भुजा प्रकट हुई और सभी से उस भुजा का पूजन किया वहां पर नागपंचमी को मेला लगने लगा और सद्दू पांडे की बेटी नरो नित्य दूध कटोरे में लेकर गोवर्धन में भोग लगाने जाती थी उसके कई समय बाद इल्लमागारु जी लक्ष्मण भट्ट जी की पत्नी थी यात्रा के दौरन उनको प्रसव पीड़ा हुई तब मृत बालक जानकर उस बालक को पेड़ के नीचे रख पत्तो से ढक आगे बढे जहां उन्होंने रात्रि में विश्राम किया तब रात्रि में स्वयं प्रभु ने आकर स्वपन में आज्ञा की और कहा वो बालक मरा नही है आप तुरंत जाकर लाइये उसका जन्म जीवो के उद्धार हेतु हुआ है तब नींद उडी और वे जाकर बालक को लेने गए तब वे देखते है बालक के चारो तरफ अग्नि जल रही है बालक की रक्षा के लिए और बालक खेल रहे हे तब वे उस बालक को लाये धीरे धीरे बालक ने शिक्षा हासिल की और उनका नाम वल्लभ रखा फिर भारत की परिक्रमा को निकले तब वे गोवर्धन के निकल पहुचे और विश्राम कर रहे थे तब श्रीनाथजी ने स्वयं आज्ञा करी और कहा में इस रूप में गोवर्धन पर प्रकट हुआ है आप आओ मुझे बाहर स्थापित करो और सेवा प्रकार प्रकट करो तब महाप्रभु श्री वलभाचार्य जी एक बृजवासी के घर के बाहर चबूतरी पर विश्राम के लिए बैठे तब नरो ने उनका स्वागत किया और थोड़ी देर हो गई तब गोवर्धन से आवाज आयीं अरे नरो दूध ला मोहे भूख लगी है तब नरो कहती है आज मेरे घर मेहमान आये हे तब पुनः आवाज आती है पर दूध लेके आ तब वलभाचार्य जी समज गये ये साधारण आवाज नही मेर नाथ की ही आवाज हे सुबह सबके संग वलभाचार्य जी पधारे तब शिलाओं में मध्य से साक्षात् श्रीनाथजी प्रकट होकर महाप्रभु वलभाचार्य जी को गले से लगा लिया यह प्रथम मिल्न था उसके बाद महाप्रभु जी ने और ब्रिजवसियो ने एक छोटा मन्दिर सिध्द कर उस मंदिर में प्रभु को बैठाया , और ब्रिजवसियो को सम्भला कर अधूरी परिक्रमा को पूर्ण करने पधारे जहां जहां उन्होंने भागवत कह प्रभु के स्वरूप और उनकी लीलाओ का गुणगान किया वह उनकी बैठक हुई इसलिए 84 बैठक अलग अलग जगह पर आज भी हे जतीपुरा मुखारविंद पर हे कुछ समय बाद पूर्णमल क्षत्रिय को ठाकुर जी ने स्वपन में आज्ञा की और कहा मेंर बड़ा मन्दिर सिद्ध करवाओ तब महाप्रभु जी और गोवर्धन की आज्ञा लेकर गोवर्धन पर ही बड़ा मन्दिर बनवाया और श्रीनाथजी को पाठ बैठाया उसके बाद एक दिन महाप्रभु जी विश्राम कर रहे और सोच रहे थे की मेरा जन्म जीव के उद्धार हेतु हुआ है तो में कैसे उनक उद्धार करा सकता है इसी चिंता में डूबे तब तब श्रीनाथजी से ये चिंता नही देखि गयी तब श्रीजी ने स्वयं आकर आज्ञा करी की आप जिन वैष्णवो का मेरे साथ ब्रह्मसम्मन्ध करबाओगे उन वैष्णवो पर मेरी विशेष कृपा रहेगी ,मेरी अनुग्रह दृष्टि सदा उन पर रहेगी में उनको चाहकर भी नही बिसरा सकता हु तब महाप्रभु जी सर्वप्रथम दामोदर दास हरसाणी को ब्रह्मसम्बन्ध दिया इस तरह से कई वैष्णवो को ब्रह्समन्ध दिया फिर अलग अलग जगह से 7 स्वरूप मदनमोहन जी , विट्ठल नाथ जी मथुराधीश जी ,द्वारिकाधीश जी ,बालकृष्ण जी ,गोकुल चन्द्रमाँ जी और अलग से नवनीत प्रिया जी का स्वरूप मिला और उन्होंने सभी की सेवा आरम्भ की पर ये सभी स्वरूप गोकुल के सतगरा में बिराजित थे फिर महाप्रभु जी के पुत्र हुए जिनमे से एक गुसाईंजी थी गुसाईंजी को सेवा मिलने के बाद वे नित्य ही श्रीनाथजी की सेवा में रहते थे और घर के सात स्वरूप की भी सेवा करते और श्रीनाथजी को खूब लाड लड़ाते और नित्य नई लीला होती इन्होंने ही अष्टसखा कीर्तनकार बैठाये पर उसके बाद गुसाईंजी जी के सात पुत्र हुए सेवा में समज आने पर सातो पुत्र को एक एक स्वरूप सेवा हेतु दिया और सभी पुत्र ने अलग अलग सेवा आरम्भ की जो आज तक सात अलग अलग गर में चल रही है जैसे विठ्लनाथ जी मदनमोहन जी द्वारिकाधीश जी आदि ,,जो की चल रहे हे ,
मेवाड़ महाराजा की बेटी अजबकुवरी बाई भी श्रीजी बावा के दर्शन को गई तब श्रीजी की कृपा से वह उनके साथ गुल मिल गयी श्रीजी बावा नित्य ब्रज से मेवाड़ उसके साथ चोपड़ खेलने को पधारते थे, अजब कुँवर बाई श्रीजी को जिताने के लिए जान बूझकर हार जाती तब श्रीजी ये जान गए और उससे पूछा तू कुछ मांगले तब उसने कहा जैसे बृज को निहाल करते हो वैसे मेवाड़ भी निहाल करो आपको भी श्रम होता है आप नित्य यहां आते हो क्यों न हमेशा के लिए आ जाओ तब श्रीनाथजी ने वचन दिया की अभी तो मुझे आचार्य जी ने पाठ बैठाया हे अभी तो नही पर कालांतर में जरूर आऊंगा कई समय बिता मुगलो ने भारत के कई मन्दिर तोड़ डाले श्रीनाथजी को नष्ट करने के इरादे से गोवर्धन पर चढ़ाई की थी तब सभी ब्रिजवसियो और आचार्यो ने श्रीजी को रथ में बिराजित कर वहां से निकले तब आचार्यो ने ब्रिजवसियो से कहा आप अपनी सम्पति और डोलत सब यही छोड़कर कहा आ रहे हो रास्ते में कुछ भी हो सकता है तब ब्रिजवसियो ने कहा हम हमारे लाला को छोड़कर कहा जावे हम संग ही चलेंगे तब ब्रिजवसी सेवक ग्वाल बाल और गौ माता और और इधर भोलेनाथ ने भी बूढ़े का वेश बनाकर मशाल हाथ में पकड़ कर संग चले अनेक जगह रुकते रुकते जोधपुर पधारे वहां राजा ने मना कर दिया की में मुगलो से इनकी रक्षा नही कर सकता में असमर्थ हु तब मेवाड़ के राजा को पत्र लिखा तब मेवाड़ के राजा ने फिर पत्र लिखा और कहा हम आपके स्वागत में तैयार है ये राजा पहले अपना सीष कटाएगा तब आपको कोई श्रम होगा मेरे होते हुए मुगलो में आप तक नही पहुचने दूंगा आप तो खूब धूम धाम से पधारो तब श्रीजी मेवाड़ पधारे और खर्च भण्डार में बिराजे इधर आदिवासियो ने मेवाड़ राजा के आदेश पर मंदिर सिद्ध करवाया और श्रीनाथजी को पाट पर बैठाया विट्ठलनाथ जी को भी प्रीतम पोल के बाहर मन्दिर में बिराजित किया लाडले लाल भी पधारे और सेवा शुरु हुई पर कई समय बाद होल्कर की सेना श्रीजी को लूटने आयी तब श्रीनाथजी को गशियार में पधराया गया क्योकि गशियार गुप्त और सुहावनी भूमि थी पर थोड़े ही समय में वहां का एक मात्र जल स्त्रोत मन्दिर के पीछे की बावड़ी का जल दूषित हो गया वल्लकुल महाप्रभु जी के वंसज के कुछ बालक लीला कर गए मतलब धरती छोड़कर चले गए और ब्रिजवसी और गाय भी बीमार पड़ गयी तब उस समय के वल्लभकुल के महाराज गिरधर जी ने श्रीजी से विनती की प्रभु आप को भी श्रम पड़ रहा है गौ और ग्वाल को भी दिक्कत पड़ रही है आपका क्या आदेश हे तब श्रीनाथजी ने गिरधर जी के मस्तक पर हाथ धर कर आज्ञा की और कहा कि पुनः नाथद्वारा में पधाराओ मुझे तब श्रीजी बावा पुंनः मेवाड़ नाथद्वारा राजस्थान बिराजे जहां आज तक उनकी नित्य सेवा चल रही है और खूब आनन्द में प्रभु बिराज रहे हे

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